राग जैतश्री
ऊधो! जो तुम हमहिं सुनायो।सो हम निपट कठिनई करिकै या मन कोँ समुझायो॥जुगुति जतन करि हमहुँ ताहि गहि सुपथ पंथ लौँ लायो।भटकि फिर्यो बोहित के खग ज्योँ, पुनि फिरि हरि पै आयो॥हमको सबै अहित लागति है तुम अति हितहि बतायो।सर-सरिता-जल होम किये तें कहा अगिनि सचु पायो?अब वैसो उपाय उपदेसौं जिहि जिय जात जियायो।एक बार जौ मिलहिं सूर प्रभु कीजै अपनो भायो॥११९॥

