मन कै मैलौ बाहरि ऊजलौ किसी रे,खाँडे की धार जन कौ धरम इसी रे॥ टेक॥हिरदा कौ बिलाव नैन बगध्यानी,ऐसी भगति न होइ रे प्रानी॥कपट की भगति करै जिन कोई,अंत की बेर बहुत दुख होई॥छाँड़ि कपट भजौ राम राई,कहै कबीर तिहुँ लोक बड़ाई॥233॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
सासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीरकवितासासु की दुखी ससुर की प्यारी जेठ के नाम डरौं रेकबीर२ मिनट का पाठ