अवधू ब्रह्म मतै घरि जाइ,काल्हि जू तेरी बँसरिया छीनी कहा चरावै गाइ॥ टेक॥तालि चुगें बन सीतर लउवा, पवति चरै सौरा मछा।बन की हिरनी कूवै बियानी, ससा फिरे अकासा॥ऊँट मारि मैं चारै लावा, हस्ती तरंडबा देई।बबूर की डरियाँ बनसी लैहूँ, सींयरा भूँकि भूँकि षाई॥आँब क बौरे चरहल करहल, निबिया छोलि छोलि खाई।मोरै आग निदाष दरी बल, कहै कबीर समझाई॥177॥

