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आह रे, वह अधीर यौवन! मत्ता-मारुत पर चढ़ उद्भ्रांत

कविता · लगभग २ मिनट
आह रे, वह अधीर यौवन!मत्ता-मारुत पर चढ़ उद्भ्रांत,बरसने ज्यों मदिरा अश्रांत-सिंधु बेला-सी घन मंडली,अखिल किरनों को ढँककर चली,भावना के निस्सीम गगन-बुद्धि-चपला का क्षण-नर्त्तन,चूमने को अपना जीवन,चला था वह अधीर यौवन!आह रे, वह अधीर यौवन!अधर में वह अधरों की प्यासनयन में दर्शन का विश्वास,धमनियों में आलिंगनमयी-वेदना लिये व्यथाएँ नयी,टूटते जिससे सब बंधनसरस सीकर- से जीवन-कन,बिखर भर देते अखिल भुवन,वही पागल अधीर यौवनआह रे, वह अधीर यौवन!मधुर जीवन के पूर्ण विकास,विश्व-मधु - ऋतु के कुसुम-विलासठहर, भर आँखों देख नयी-भूमिका अपनी रंगमयी,अखिल की लघुता आई बन-समय का सुन्दर वातायन,देखने को अदृष्ट नर्त्तन ।अरे अभिलाषा के यौवन!आह रे, वह अधीर यौवन!

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