आजु हरि खेलत फागु बनी।इत गोरी रोरी भरि भोरी, उत गोकुल को धनी॥चोवा कों ढोवा भरि राख्यो केसर-कीच घनी।अबिर गुलाल उड़ावत गावत, सारी जात सनी॥हाथन लसत कनक पिचकारी, ग्वालन छूट छनी।नंददास प्रभु होरी खेलत, मुरि-मुरि जात अनी॥

आजु हरि खेलत फागु बनी
नंददासपद · लगभग २ मिनट