राग गौरी
उपमा एक न नैन गही।कबिजन कहत कहत चलि आए सुधि करि करि काहू न कही॥कहे चकोर, मुख-बिधु बिनु जीवन; भँवर न, तहँ उड़ि जात।हरिमुख-कमलकोस बिछुरे तें ठाले क्यों ठहरात?खंजन मनरंजन जन जौ पै, कबहुँ नाहिं सतरात।पंख पसारि न उड़त, मंद ह्वै समर-समीप बिकात॥आए बधन ब्याध ह्वै ऊधो, जौ मृग, क्यों न पलाय?देखत भागि बसै घन बन में जहँ कोउ संग न धाय॥ब्रजलोचन बिनु लोचन कैसे? प्रति छिन अति दुख बाढ़त।सूरदास मीनता कछू इक, जल भरि संग न छाँड़त॥९७॥

