अब मैं जाँणिबौ रे केवल राइ की कहाँणी।मझां जोति राम प्रकासै, गुर गमि बाँणी॥ टेक॥तरवर एक अनंत मूरति, सुरताँ लेहू पिछाँणीं।साखा पेड़ फूल फल नाँहीं, ताकि अंमृत बाँणीं॥पुहुप बास भवरा एक राता, बरा ले उर धरिया।सोलह मंझै पवन झकोरैं, आकासे फल फलिया॥सहज समाधि बिरष यह सीचा, धरती जरु हर सोब्या।कहै कबीर तास मैं चेला, जिनि यहु तरुवर पेष्या॥166॥

अब मैं जाँणिबौ रे केवल राइ की कहाँणी
कबीरपद · लगभग २ मिनट