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हाशिया
कविता
हुवै न बूझणहार
कृपाराम खिड़िया
सोरठा · लगभग २ मिनट
हुवै न बूझणहार, जांणै कुण कीमत जठै।
बिन ग्राहक व्यौपार, रुल्यौ गिणीजै राजिया॥
॥
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मद विद्या धन मांन
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एक जतन सत एह
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