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हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँ

साखी · लगभग २ मिनट
हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँ।छूटि पड़ौ या विरह तै, जे सारी ही जलि जाऊँ॥३६॥

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