हौं विरहा की लाकड़ी, समझि समभि धूँधाऊँ।छूटि पड़ौ या विरह तै, जे सारी ही जलि जाऊँ॥३६॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
स्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीरकवितास्वर्ग वास न बाछियै डारियै न नरक निवासुकबीर२ मिनट का पाठ