गणिका-प्रवत्स्यत्प्रेयसी पीतम एक सुमिरिनिआ, मोंहि दै जाहु।जेहिं जपि तोर बिरहवा, करब निबाहु॥८६॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+