आछे कमल कोस-रस लोभी द्वै अलि सोच करे।कनक बेलि औ नवदल के ढिग बसते उझकि परे॥कबहुँक पच्छ सकोचि मौन ह्वै अंबुप्रवाह झरे।कबहुँक कंपित चकित निपट ह्वै लोलुपता बिसरे॥बिधु-मंडल के बीच बिराजत अंमृत अंग भरे ।एतेउ जतन बचत नहिं तलफत बिनु मुख सुर उचरे॥कीर, कमठ, कोकिला उरग-कुल देखत ध्यान धरे।आपुन क्यों न पधारौ सूर प्रभु, देखे कह बिगरे॥३१७॥

आछे कमल कोस-रस लोभी द्वै अलि सोच करे
सूरदासपद · लगभग २ मिनट