बेद पुरान सबै मत सुनि के करी करम की आसा।काल ग्रस्त सब लोग सियाने उठि पंडित पै चले निरासा॥मन रे सरो न एकै काजा। भाज्यो न रघुपति राजा।बन खंड जाइ जोग तप कीनो कंद मूल चुनि खाया।नादी बेदी गबदी मौनी जम के परै लिखाया॥भगति नारदी रिदै न आई काछि कूछि तन दीना।राम रागनी डिंभ होइ बैठा उन हरि पहि क्या लीना॥अरयो काल सबै जग ऊपर माहि लिखे भ्रम ज्ञानी।कहु कबीर जन भये खलासे प्रेम भगति जिह जानी॥193॥

बेद पुरान सबै मत सुनि के करी करम की आसा
कबीरपद · लगभग २ मिनट