खैंचि चढ़नि ढीली ढरनि, कहहु कौन यह प्रीति।आजु काल्हि मोहन गही, बंस-दिया की रीति॥४२॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीमकविताबिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीम२ मिनट का पाठ