इक तु पतरि भरि उरकट कुकरट इक तू पतरि भरि पानी॥आस पास पंच जोगिया बैठे बीच नकटि देरानी॥नकटी को ठनगन बाड़ाडूं किनहिं बिबेकी काटी तूं॥सकल माहि नकटी का बासा सकल मारिऔ हेरी॥सकलिया की हौ बहिन भानजी जिनहि बरी तिसु चेरी॥हमरो भर्ता बड़ो विवेकी आपे संत कहावै॥आहु हमारे माथे काइमु और हमरै निकट न आवै॥नाकहु काटी कानहु काटी कूटि कै डारीं॥कहु कबीर संतन की बैरनि तीनि लोक की प्यारी॥20॥

