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जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस,फुर्न रसना नहिं राम

साखी · लगभग २ मिनट
जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, फुर्न रसना नहिं राम ।ते नर इस स्ंसार में, उपजि पये बेकाम ॥१७॥

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