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हाशिया
कविता
कन कन जोरै मन जुरै खाते निवरै सोय
वृंद
दोहा · लगभग २ मिनट
कन कन जोरै मन जुरै खाते निवरै सोय।
बूंद बूंद ज्यौं घट भरै टपकत बोतै तोय॥
॥
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खल जन सों कहियै नही गूढ़ कबहुँ करि मेल
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जो जाकौ गुन जानही सो तिहिँ आदर देत
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जाके सँग दूषन दुरै करिए तिहिँ पहिचानि
वृंद
कविता
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२ मिनट का पाठ
करै बुराई सुख चहै कैसै पावै कोइ
वृंद
कविता
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वृंद
२ मिनट का पाठ
हलन चलन की सकति है तौ लौं उद्यम ठानि
वृंद
कविता
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वृंद
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