यहु ठग ठगत सकल जग डोलै, गवन करै तब मुषह न बोलै॥तूँ मेरो पुरिषा हौं तेरी नारी, तुम्ह चलतैं पाथर थैं भारी।बालपनाँ के मीत हमारे, हमहिं लाडि कत चले हो निनारे॥हम सूँ प्रीति न करि री बौरी, तुमसे केते लागे ढौरी॥हम काहू संगि गए न आये, तुम्ह से गढ़ हम बहुत बसाये॥माटी की देही पवन सरीरा, ता ठग सूँ जन डरै कबीरा॥394॥

