अवधू ऐसा ग्यान बिचार,भेरैं चढ़े सु अधधर डूबे, निराधार भये पारं॥ टेक॥ऊघट चले सु नगरि पहुँचे, बाट चले ते लूटे।एक जेवड़ी सब लपटाँने, के बाँधे के छूटे॥मंदिर पैसि च्हूँ दिसि भीगे, बाहरि रे ते सूका।सरि मारे ते सदा सुखारे, अनमारे ते दूषा॥बिन नैनन के सब जग देखै, लोचन अछते अंधा।कहै कबीर कछु समछि परी है, यहु जग देख्या धंधा॥175॥

