एक दिन प्रातःकाल एक गरीब किसान घर से दो रोटी पल्ले बाँधकर हल जोतने चला। खेत में पहुँचकर रोटी तो उसने एक झाड़ी तले रख दी और आप हल चलाने लगा। दुपहरी होने पर उसने बैलों को चरने छोड़ दिया और आकर जब रोटी उठाने लगा तो रोटी नदारद!
इधर देखा, उधर देखा, कु छ पता नहीं। कोई जाता भी दिखाई नहीं दिया। फिर रोटी किसने उठा ली??
वास्तव में रोटी एक भूत ने उठा ली थी। वह झाड़ी के पीछे छिपा बैठा था।
किसान बोला – क्या हुआ, एक दिन रोटी न खायी तो मर नहीं जाऊँ गा। किसी भूखे ने ही उठायी है, भगवान् उसका भला करें।
यह कहकर कु एँ पर पानी पी, उसने फिर खेत जोतना आरम्भ कर दिया। भूत उदास होकर अधर्म के पास पहुँचा और उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया। अधर्म – (क्रोध से) तुम मूर्ख हो, काम करना क्या जानो! यदि संसारी लोग इस प्रकार संतोष करके जीवन व्यतीत करने लगेंगे तो हमारा बेड़ा ही डूब जाएगा। जाओ, तुरन्त जाकर कोई ऐसा उपाय करो कि मनुष्यों में संतोष और दया-भाव का लोप हो जाए, नहीं तो तुम्हें फाँसी पर लटका दिया जायेगा।
भूत लौटकर विचार करने लगा कि क्या यत्न किया जाए। सोचते- सोचते उसे उपाय सूझ ही गया।
उसने एक किसान का रूप धर लिया और उसी किसान के पास जाकर नौकर हो गया पहले वर्ष तो उसने किसान को यह सलाह दी कि दलदल में खेती बोओ। दैवगति से उस साल चौमासा न लगा, तो लोगों की खेतियाँ जल गई। इस किसान को बड़ा लाभ हुआ। खाल की धरती होने के कारण काफी अनाज उगा।
दूसरे वर्ष उसने किसान के कहकर एक ऊँ चे टीले पर खेती बुवायी। कालवश अति-वृष्टि होने के कारण सब खेतियाँ पानी में डूबकर सड़ गई। इस किसान को कोई हानि नहीं पहुँची।
अब किसान के पास इतना जौ पैदा हुआ कि कोठे भर गए। करे तो क्या करे? भूत ने उसे जौ से मद्य बनना सिखला दिया। बस, फिर क्या था, किसान मद्य बना-बनाकर मित्रों-सहित उसका सेवन करने लगा। भूत ने अधर्मराज के पास पहुँचकर विनय की – महाराज अब चलकर देखिए कि मैंने कै सा मंत्र चलाया है, अब किसान कदापि नहीं बच सकता। अतएव वे दोनों किसान के घर पर पहुँचे।
देखा कि वहाँ आस-पास के किसान एकत्र हैं। किसान की स्त्री उन सबको मद्य पिला रही है। इतने में उसने ठोकर खायी और मद्य का प्याला उसके हाथ से छू ट गया।
किसान – (क्रोधातुर) फू हड़ कहीं की! क्या तू इसे डाब का पानी समझती है?
भूत ने अधर्म से कहा – यह वही किसान है, जो रं क होने पर भी रोटी खाने की कु छ भी चिंता नहीं किया करता था।
स्त्री की झिड़क-कर किसान आप मद्य पिलाने लगा। उसी समय वहाँ कोई साधु भोजन माँगने आ गया। किसान उसे दुत्कारकर बोला – जाओ यहाँ से, क्यों भीतर घुस आते हो? यहाँ भोजन- वोजन कु छ नहीं।
अधर्म बड़ा प्रसन्न हुआ। भूत बोला – अभी क्या है, देखते जाइए, क्या-क्या होता है!
सब किसान पहला प्याला पीकर मस्त हो गए और आपस में चिकनी-चुपड़ी बातें करने लगे। अधर्म – वाह भाई भूत, क्या कहना, यदि ये लोग मद्य के भक्त बनकर एक-दूसरे से लोमड़ियों की तरह कपट की बात करने लगेंगे तो हमारा राज्य अचल हो जाएगा।
भूत – महाराज, अभी तो पहला ही प्याला है, दूसरा प्याला पीने दीजिए, फिर इनको आप बाघ के रूप में देखेंगे।
दूसरा प्याला पीने की देर थी कि वे लोग लगे आपस में कोलाहल और हाथापाई करने। किसी ने किसी की नाक काट ली, किसी ने किसी का कान। स्वयं घर के मालिक पर बे-भाव की पड़ी।
अधर्म – (अति प्रसन्नता से) वाह-वाह, क्या खूब!
भूत – बस, तीसरा प्याला पेट में गया कि सब-के -सब सूअर बने।
किसानों ने तीसरा प्याला पी लिया। दृश्य ही और हो गया। वे पशु समान नंगे होकर नाचने लगे। कोई इधर भागा, कोई उधर। कोई कहीं गिर पड़ा, कोई कहीं। किसान दौड़कर मोरी में गिर पड़ा और सूअर की भाँति वही पड़ा हल्ला मचाता रहा।
अधर्म – भाई भूत, तुमने तो बड़ा काम किया, यह मंत्र तो एक ही है। मेरी समझ में तुमने मद्य बनाते समय उसमें लोमड़ी, बाघ और सूअर का रुधिर अवश्य मिला दिया है, जिससे यह बारी-बारी लोमड़ी, बाघ और सूअर बन गए।
भूत – महाराज, यह बात नहीं। यह नियम है कि मनुष्य को नित्य के वल क्षुधा-निवारण करने को अन्न मिलता रहता है, तो वह कोई उपद्रव नहीं करता। ज्योंही उसे अधिक मिल कि उसने धूम मचायी। बस यही मंत्र मैंने इस किसान पर चलाया है। जब तक वह निर्धन था, संतोष से जीवन व्यतीत करता था। मैंने इसे इतना अन्न दिया कि उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। मद्य बनाना सीखकर उसने परमेश्वर के दिये हुए गुणकारक पदार्थों को विषय-भोग के निमित्त मादक बना डाला। लोमड़ी, बाघ और सूअर का अंश उसमें पहले से उपस्थित था। अवसर पाते ही सब कु छ प्रकट हो गया। अब वह मद्य-भक्त होकर सदैव पशु बना रहेगा।
अधर्म ने अति प्रसन्न होकर भूत को प्रधान की पदवी दे दी।
