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देव- देहि अवलंब कर कमल, कमलारमन, दमन-दुख, शमन-संताप भारी

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देव-देहि अवलंब कर कमल, कमलारमन, दमन-दुख, शमन-संताप भारी।अज्ञान-राकेश-ग्रासन विंधुतुद, गर्व-काम-करिमत्त-हरि, दूषणारी ॥ १ ॥वपुष ब्रह्माण्ड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी।विविध कोशौघ, अति रुचिर-मंदिर-निकर, सत्वगुण प्रमुख त्रेकटककारी ॥ २ ॥कुणप-अभिमान सागर भंयकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं।नक्र रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प वीची-विकारं ॥ ३ ॥मोह दशमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी।लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ठ-विबुधांतकारी ॥ ४ ॥द्वेष दुर्मुख, दंभ खर अकंपन कपट, दर्प मनुजाद मद शूलपानी।अमितबल परम दुर्जय निशाचर-निकर सहित षडवर्ग गो-यातुधानी ॥ ५ ॥जीव भवदंघ्रि-सेवक विभीषण बसत मध्य दुष्टाटवी ग्रसितचिंता।नियम-यम-सकल सुरलोक-लोकेश लंकेश-वश नाथ! अत्यंत भीता ॥ ६ ॥ज्ञान-अवधेश-गृह गेहिनी भक्ति शुभ, तत्र अवतार भूभार-हर्ता।भक्त-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भर्ता ॥ ७ ॥कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू।प्रबल वैराग्य दारुण प्रभंजन-तनय, विषय वन भवनमिव धूमकेतू ॥ ८ ॥दुष्ट दनुजेश निर्वशकृत दासहित, विश्वदुख-हरण बोधैकरासी।अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा दासतुलसी ह्रदय कमलवासी ॥ ९ ॥

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