केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये।मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिये ॥ १ ॥सहस सिलातें अति जड़ मति भई है।कासों कहौं कौन गति पाहनिहिं दई है ॥ २ ॥पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं।कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं ॥ ३ ॥करम-कपीस बालि-बली, त्रास-त्रस्यो हौं।चाहत अनाथ-नाथ! तेरी बाँह बस्यो हौं ॥ ४ ॥महा मोह-रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं।त्राहि, तुलसीस! त्राहि तिहूँ ताप तयो हौं ॥ ५ ॥

केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिये
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट