मधुकर! कान्ह कही ते न होही।कै ये नई सीख सिखई हरि निज अनुराग बिछोही ।। 1 ।।राखी सचि कूबरी पीठ पर ये बातें बकुचौहीं।स्याम सो गाहक पाइ सयानी! खोलि देखाई है गौहीं ।। 2 ।।नगर मनि सो सागर जेहिं जग जुबतीं हँसि मोहीं।लियो रूप दै ग्यान गाँठरी भलो ठग्यो ठगु ओहीं ।। 3 ।।है निर्गुन सारी बारिक, बलि घरी करौं, हम जोही।तुलसी ये नागरिन्ह जोग पट, जिन्हहि आजु सब सोही ।। 4 ।।

मधुकर! कान्ह कही ते न होही
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट