विषिया अजहू सख आसा, हूँण न देइ हरि के चरन निवासा॥ टेक॥सुख माँगे दुख पहली आवै, तातै सुख माँग्याँ नहीं भावै॥जा सुख थें सिव बिरंचि डराँनाँ, सो मुख हमहु साच करि जाना।सुखि छ्या ड्या तब सब दुख भागा, गुर के सबद मेरा मन लागा॥निस बासुरि विषैतनाँ उपगार, विषई नरकि न जाताँ बार।कहैं कबीर चंचल मति त्यागी, तब केवल राम नाम त्यौं लागी॥82॥

