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सत्तरि सै इसलारू है जाके

पद · लगभग २ मिनट
सत्तरि सै इसलारू है जाके। सवा लाख है कावर ताके॥सेख जु कही यही कोटि अठासी। छप्पन कोटि जाके खेल खासी॥सो गरीब की को गुजरावै। मजलसि दूरि महल को पावै॥तेतसि करोडि है खेल खाना। चौरासी लख फिरै दिवाना॥बाबा आदम कौ कछु न हरि दिखाई। उनभी भिस्त घनेरी पाई॥दिल खल हलु जाकै जर दरुबानी। छोड़ि कतेब करै सैतानी॥दुनिया दोस रोस है लोई। अपना कीया पावे सोई॥तुम दाते हम सदा भिखारी। देउ जवाब होइ बजगारी॥दास कबीर तेरी पनह समाना। भिस्त नजीक राखु रहमाना॥199॥

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