सनक आनंद अंत नहीं पाया। बेद पढ़ै ब्रह्मै जनम गवाया।हरि का विलोबना विलोबहु मेरे भाई। सहज विलोबहु जैसे तत्व जाई॥तन करि मटकी मन माहि बिलोई। इसु मटकी महि सबद संजोई॥हरि का बिलोना तन का बीचारा। गुरु प्रसाद पावै अमृत धारा॥कहु कबीर न दर करे जे मीरा। राम नाम लगि उतरे तीरा॥200॥

सनक आनंद अंत नहीं पाया
कबीरपद · लगभग २ मिनट