हिंदू तुरक कहाँ ते आये किन एह राह चलाई।दिल महि सोच बिचार कवादे भिस्त दोजक कित पाई॥काजी तै कौन कतेब बखानी॥पढ़त गुनत ऐसे सब मारे किनहू खबरू न जानी॥सकति सनेह करि सुन्नति करियै मैं न बदौगा भाई॥जौ रे खुदाई मोहि तुरक करैगा आपन ही कटि जाई॥सुन्नत किये तुरक जे होइगा औरत का क्या करियै॥अर्द्ध सरीरी नारि न छोड़े तातें हिंदू ही रहिये॥छाड़ि कतेब राम भजु बौरे जुलम करत है भारी॥कबीर पकरी टेक राम की तुरक रहे पचि हारी॥219॥

