संत धोखा कासूँ कहिए।गुँण मैं निरगुँण निरगुँण मैं गुण है, बाट छाँड़ि क्यूँ बहिए॥ टेक॥अजरा अमर कथैं सब कोई, अला न कथणाँ जाई।नाति सरूप बरण नहीं जाकै, घटि घटि रह्यौ समाई॥प्यंड ब्रह्मंड कथै सब कोई, वाकै आदि अरु अंत न होई।प्यंड ब्रह्मंड छाड़ि जे कथिए, कहैं कबीर हरि सोई॥180॥

