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बाबा करहु कृपा जन मारगि, लावो ज्यूँ भव बंधन षूटै

पद · लगभग २ मिनट
बाबा करहु कृपा जन मारगि, लावो ज्यूँ भव बंधन षूटै।जरा मरन दुख फेरि करँन सुख, जीव जनम यैं छूटै॥ टेक॥सतगुरु चरन लागि यों बिनऊँ, जीवनि कहाँ थैं पाई।जा कारनि हम उपजैं बिनसै क्यूँ न कहौ समझाई॥आसा पास षंड नहीं पाँडे, यौं मन सुंनि न लूटै।आपा पर आनंद न बूझै, बिन अनभै क्यूँ छूटै॥कह्याँ न उपजै नहीं जाणै, भाव अभाव बिहूनाँउदै अस्त जहाँ मति बुधि नाहीं, सहजि राम ल्यौ लीनाँ॥ज्यूँ बिंबहि प्रतिबिंब समाँनाँ, उदिक कुंभ बिगराँनाँ।कहै कबीर जाँनि भ्रम भागा, जीवहिं जीव समाँनाँ॥179॥

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