मन रे जब तैं राम कह्यौ, पीछै कहिबे कौ कछू न रह्यौ॥ टेक॥का जाग जगि तप दाँनाँ, जौ तै राम नाम नहीं जाँना॥काँम क्रोध दोऊ भारे, ताथैं गुरु प्रसादि सब जारे॥कहै कबीर भ्रम नासी, राजा राम मिले अबिनासी॥265॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+