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मन रे सर्यौ न एकौ काजा, ताथैं भज्यौ न जगपति राजा

पद · लगभग २ मिनट
मन रे सर्यौ न एकौ काजा, ताथैं भज्यौ न जगपति राजा॥ टेक॥बेद पुराँन सुमृत गुन पढ़ि गुनि भरम न पावा।संध्या गायत्री अरु षट करमाँ, तिन थैं दूरि बतावा॥बनखंडि जाइ बहुत तप कीन्हाँ, कंद मूल खनि खावा।ब्रह्म गियाँना अधिक धियाँनी, जम कै पटैं लिखावा॥रोजा किया निवाज गुजारी, बंग दे लोग सुनावा।हिरदै कपट मिलै क्यूँ साँई, क्या हल काबै जावा॥पहरौं काल सकल जग ऊपरि, माँहै लिखे सब ग्याँनी।कहै कबीर ते भये षालसे, राम भगति जिनि जाँनी॥264॥

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