अंधै हरि बिन को तेरा, कवन सूँ कहत मेरी मेरा॥ टेक॥तजि कुलाकष्म अभिमाँनाँ, झूठे भरमि कहा भुलानाँ॥झूठे तन की कहा बड़ाई, जे निमष माँहि जरि जाई॥जब लग मनहिं विकारा, तब लगि नहीं छूटै संसारा।जब मन निरमल करि जाँनाँ, तब निरमल माँहि समानाँ।ब्रह्म अगनि ब्रह्म सोई, अब हरि बिन और न कोई॥जब पाप पुँनि भ्रँम जारी, तब भयो प्रकास मुरारी।कहैं कबीर हरि ऐसा, जहाँ जैसा तहाँ तैसा॥भूलै भरमि परै जिनि कोई, राजा राम करै सो होई॥263॥

