है हजूरि क्या दूर बतावै,दुंदर बाँधे सुंदर पावै॥ टेक॥सो मुलनां जो मनसूँ लरै, अह निसि काल चक्र सूँ भिरै।काल चक्र का मरदै मांन, तां मुलनां कूँ सदा सलांम॥काजी सो जो काया बिचारे, अहनिसि ब्रह्म अगनि प्रजारै।सुप्पनै बिंद न देई झरनां, ता काजी कूँ जुरा न मरणां॥सो सुलितान जु द्वै सुर तानै, बाहरि जाता भीतरि आनै।गगन मंडल मैं लसकर करै, सो सुलितान छत्रा सिरि धरै॥जोगी गोरख गोरख करै, हिंदू राम नाम उच्चरै।मुसलमान कहै एक खुदाइ, कबीरा को स्वांमी घटि घटि रह्यो समाइ॥330॥

है हजूरि क्या दूर बतावै
कबीरपद · लगभग २ मिनट