भजि गोब्यंद भूमि जिनि जाहु, मनिषा जनम कौ एही लाहु॥ टेक॥गुर सेवा करि भगति कमाई, जौ तै मनिषा देही पाई।या देही कूँ लौचै देवा, सो देही करि हरि कि सेवा॥जब लग जरा रोग नहीं आया, तब लग काल ग्रसै नहिं काया।जब लग हींण पड़े नहीं वाणीं, तब लग भजि मन सांरंगपाणीं॥अब नहीं भजसि भजसि कब भाई, आवेगा अंत भज्यौ जाई॥जे कछू करौ सोई तत सार फिरि पछितावोगे बार न पार॥सेवग सो जो लागे सेवा, तिनहीं पाया निरंजन देवा।गुर मिलि जिनि के खुले कपाट, बहुरि न आवै जोनी बाट॥यहु तेरा औसर यहु तरि बार, घट ही भीतरि सोचि बिचारि।कहै कबीर जीति भावै हारि बहु बिधि कह्यौ पुकारि पुकारि॥348॥

