थरथर कंपै बाला जीउ। ना जानौ क्या करसी पीउ॥रैनि गई मति दिन भी जाइ। भवर गये बग बैठे आइ॥काचै करबै रहै न पानी। हंस चला काया कुम्हिलानी॥क्वारी कन्या जैसे करत सिंगारा। क्यों रलिया मानै बोझ भतारा॥काग उड़ावत भुजा पिरानी। कहि कबीर इह कथा सिरानी॥110॥

थरथर कंपै बाला जीउ
कबीरपद · लगभग २ मिनट