रे मन तेरा कोइ नहीं खिचि लेइ जिन भार।बिरख बसेरा पंखि कर तैसो इहु संसार॥राम रस पीया रे जिह रस बिसरि गये रस और।और मुये क्या रोइये जा आपा थिर न रहाइ॥जा उपजै सो बिनसिहे दुख करि रोवै बलाइ।जह की उपजी तह़ रची पीवतु मरद न लाग॥कह कबीर चित चेतिया राम सिमिर बैराग॥182॥

रे मन तेरा कोइ नहीं खिचि लेइ जिन भार
कबीरपद · लगभग २ मिनट