मन मूरिखा तैं क्या कीया, कुछ पीव कारणि बैरागन लिया।रे तैं जप-तप साधी क्या किया॥रे तैं करवत कासी कदि सह्या, रे तैं गंगा माहिं ना बह्या।रे तैं बिरहिण ज्यों दुख ना सुह्या॥रे तैं पाले परबत ना गल्या, के तैं आप हिआपा न दह्या।रे तैं पीव पुकारी कदि कह्या॥होइ प्यासै हरि जल ना पिया, रे तैं बजर न फाटौ रे हिया।धिग जीवन दादू ये जिया॥

