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आपा खोज रे जिय भाई

सबद · लगभग २ मिनट
आपा खोज रे जिय भाई।आपा खोजे त्रिभुवन सूझे, अंधकार मिटि जाई॥जोई मन सोई परमेसुर, कोइ बिरला अवधू जाने।जौन जोगी सुर सब घट व्यापक, सो यह रूप बखाने॥सब्द अनाहत होत जहाँ तें, तहां ब्रह्म कर बासा।गगन मंडल में करत कलोले, परम जोति परगासा॥कहत मलुका निरगुन के गुन, कोई बड़भागी गावै।क्या गिरही और क्या बैरागी, जेहि हरि देय सो पावै॥

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