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हाशिया
कविता
जातें कबहूँ न जानिये, यौं मन नीकसि जाइ
सुंदरदास
दोहा · लगभग २ मिनट
जातें कबहूँ न जानिये, यौं मन नीकसि जाइ।
आवत कछू न देखिये, सुन्दर किसी बलाइ॥
॥
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आपु हि फेरी लेत है, फिरते दीसै आंन
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सुन्दर सद्गुरु यों कह्या, शब्द सकल का मूल
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कविता
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कविता
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सुंदरदास
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