लाल हौ तुम सों बहौत लरी।सपुनें में मोहि छाँड़ि गये क्यों, नैक न कान करी॥सिथिल करे मैं पेच पाग के, अलकावलि बिथुरी।डस्यौ अधर, छत किये कपोलन, चित नहीं सकुच धरी॥बिबिध भाँति स्रम करत समर में, सुधि बुधि सब बिसरी।कहौ कहाँ लों लिपटी अब लौं, बहुतै चूक परी॥जाग परी मन में पछितानी, बिरहा अगिन जरी।बिनती करत परत पाँयनु में, मन में निपट डरी।करुनासिंधु ‘रसिक प्रीतम’, मेरौ हरौ अपराध हरी॥

