श्री विट्ठलनाथ गोकुल-भूप।भक्त-हित कलिजुग कृपा करि धरे प्रगट स्वरूप॥सकल धर्म-धुरंधरन हरि-भक्ति निजु दृढ जूप।चरन अंबुज सिरसि परसत सोषकर अंधकूप॥आपु ही सेवा सिखावत, सकल रीति अनूप।भोग, राग, सिंगार नाना चरचि दीप अरु धूप॥‘चतुर्भुज’ प्रभु गिरिधरन जुग बपु लीला सदा अछूप।नंद-नंदन बल्लभ-नंदन एकमन द्वै रूप॥

श्री विट्ठलनाथ गोकुल-भूप
चतुर्भुजदासपद · लगभग २ मिनट