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सेवासदन

अध्याय ३४

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द्यपि डॉक्‍टर साहब का बंगला निकट ही था, पर इन दोनों आदमियों ने एक किराए की गाड़ी की। डॉक्‍टर साहब के यहाँ पैदल जाना फैशन के विरुद्ध था। रास्‍ते में विट्ठलदास ने आज के सारे समाचार बढ़ा-चढ़ाकर बयान किए और अपनी चतुराई को खूब दर्शाया।

पद्मसिंह ने यह सुनकर चिंति‍त भाव से कहा-तो अब हमको और सतर्क होने की जरूरत है। अंत में आश्रम का सारा भार हमीं लोगों पर आ पड़ेगा। बलभद्र अभी चाहे चुप रह जाएं, लेकिन इसकी कसर कभी-न-कभी निकालेंगे अवश्‍य।

विट्ठलदास-मैं क्‍या करूं? मुझसे यह अत्‍याचार देखकर रहा नहीं जात। शरीर में एक ज्‍वाला-सी उठने लगती है। कहने को ये लोग विद्वान्, बुद्धिमान हैं, नीति-परायण हैं, पर उनके ऐसे कर्म? अगर मुझमें कौशल से काम लेने की सामर्थ्‍य होती, तो कम-से-कम बलभद्रदास से लड़ने की नौबत न आती।

पद्मसिंह-यह तो एक दिन होना ही था। यह भी मेरे ही कर्मों का फल है। देखूं, अभी और क्‍या-क्‍या गुल खिलते हैं? जब से बारात वापस आई है, मेरी विचित्र दशा हो गई है। न भूख, न प्‍यास, रात-भर करवटें बदला करता हूँ। यही चिंता लगी रहती है कि उस अभागिन कन्‍या का बेड़ा कैसे पार लगेगा। अगर कहीं आश्रम का भार सिर पर पड़ा, तो जान ही पर बन आएगी। ऐसे अथाह दलदल में फंस गया हूँ कि ज्‍यों-ज्‍यों ऊपर उठना चाहता हूँ और नीचे दब जाता हूँ।

यही बात करते-करते डॉक्‍टर साहब का बंगला आ गया। दस बजे थे। डॉक्‍टर साहबअपने सुसज्जित कमरे में बैठे हुए अपनी बड़ी लड़की मिस कान्ति से शतरंज खेल रहे थे। मेज पर दो टेरियर कुत्ते बैठे हुए बड़े ध्‍यान से शतरंज की चालों को देख रहे थे और कभी-कभी जब उनकी समझ में खिलाडि़यों से कोई से कोई भूल हो जाती थी, तो पंजों से मोहरों को उलट-पलट देते थे। मिस कान्ति उनकी इस शरारत पर हंसकर अंग्रेजी में कहती थीं, ‘यू नाटी।’

मेज की बाई ओर एक आराम-कुर्सी पर सैयद तेग अली साहब विराजमान थे और बीच-बीच में मिस कान्ति को चालें बताते जाते थे। इतने में हमारे दोनों मित्र जा पहुँचे। डॉक्‍टर साहब ने उठकर दोनों सज्‍जनों से हाथ मिलाया। मिस कान्ति ने उनकी ओर दबी निगाह से देखा और मेज पर से एक पत्र उठाकर पढ़ने लगी।

डॉक्‍टर साहब ने अंग्रेजी में कहा-मैं आप लोगों से मिलकर बहुत प्रसन्‍न हुआ। आइए, आप लोगों को मिस कान्ति से इंट्रोड्यूस करा दूं।

परिचय हो जाने पर मिस कान्ति ने दोनों आदमियों से हाथ मिलाया और हंसती हुई बोली-बाबा अभी आप लोगों का जिक्र कर रहे थे। मैं आपसे मिलकर बहुत प्रसन्‍न हुई।

डॉक्‍टर श्‍यामाचरण-मिस कान्ति अभी डलहौजी पहाड़ से आई हैं। इनका स्‍कूल जाड़े में बंद हो जाता है। वहाँ शिक्षा का बहुत उत्तम प्रबंध है। यह अंग्रेजों की लड़कियों के साथ बोर्डिंग-हाऊस में रहती हैं। लेडी प्रिंसिपल ने अब की इनकी प्रशंसा की है। कान्ति, जरा अपनी लेडी प्रिंसिपल की चिट्ठी इन्‍हें दिखा दो। मिस्‍टर शर्मा, आप कान्ति की अंग्रेजी बातें सुनकर दंग रह जाएंगे। (हंसते हुए) यह मुझे कितने ही नए मुहावरे सिखा सकती हैं।

मिस कान्ति ने लजाते हुए अपना प्रशंसा-पत्र पद्मसिंह को दिखाया। उन्‍होंने उसे पढ़कर कहा-आप लैटिन भी पढ़ती हैं?

डॉक्‍टर साहब ने कहा-लैटिन में अब की परीक्षा में इन्‍हें एक पदक मिला है। कल क्‍लब में कान्ति ने ऐसा अच्‍छा गेम दिखाया कि अंग्रेज लेडियां दंग रह गई। हां, अबकी बार आप हिंदू मेंबरों के जलसे में नहीं थे?

पद्मसिंह-जी नहीं, मैं जरा मकान तक चला गया था।

डॉक्‍टर-आप ही के प्रस्‍ताव पर विचार किया गया। मैं तो उचित समझता हूँ कि अभी उसे बोर्ड में पेश करने की जल्‍दी न करें। अभी सफलता की बहुत कम आशा है।

तेगअली बोले-जनाब, मुसलमान मेंबरों की तरफ से तो आपको पूरी मदद मिलेगी।

डॉक्‍टर-हां, लेकिन हिंदू मेंबरों में तो मतभेद है।

पद्मसिंह-आपकी सहायता हो जाए तो सफलता में काई संदेह न रहे।

डॉक्‍टर-मुझे इस प्रस्‍ताव से पूरी सहानुभूति है, लेकिन आप जानते हैं, मैं गवर्नमेंट का नामजद किया हुआ मेंबर हूँ। जब तक यह मालूम न हो जाए कि गवर्नमेंट इस विषय को पसंद करती है या नहीं, तब तक मैं ऐसे सामाजिक प्रश्‍न पर कोई राय नहीं दे सकता।

विट्ठलदास ने तीव्र स्‍वर से कहा-जब मेंबर होनेसे आपके विचार-स्‍वातंत्र्य में बाधा पड़ती है, तो आपको इस्‍तीफा दे देना चाहिए।

तीनों आदमियों ने विट्ठलदास को उपेक्षा की दृष्टि से देखा। उनका कथन असंगत था। तेगअली ने व्‍यंग्‍य भाव से कहा-इस्‍तीफा दे दें, तो सम्‍मान कैसे हो? लाट साहब के बराबर कुर्सी पर कैसे बैठे? आनरेबल कैसे कहलाएं? बड़े-बड़े अंग्रेजों से हाथ मिलाने का सौभाग्‍य कैसे प्राप्‍त हो? सरकारी डिनर में बढ़-चढ़कर हाथ मारने का गौरव कैसे मिले? नैनीताल की सैर कैसे करें? अपनी वक्तृता का चमत्‍कार कैसे दिखाएं? यह भी तो सोचिए।

विट्ठलदास बहुत लज्जित हुए। पद्मसिंह पछताए कि विट्ठलदास के साथ नाहक आए।

डॉक्‍टर साहब गंभीर भाव से बोले-साधारण लोग समझते हैं कि इस लालच से लोग मेंबरी के लिए दौड़ते हैं। वह यह नहीं समझते कि वह कितना जिम्‍मेदारी का काम है। गरीब मेंबरों को अपना कितना समय, कितना विचार, कितना धन, कितना परिश्रम इसके लिए अर्पण करना पड़ता है। इसके बदले उसे इस संतोष के सिवाय और क्‍या मिलता है कि मैं देश और जाति की सेवा कर रहा हूँ। ऐसा न हो, तो कोई मेंबरी की परवाह न करे।

तेगअली-जी हां, इसमें क्‍या शक है ! जनाब ठीक फरमाते हैं। जिसके सिर पर यह अजीमुश्‍शान जिम्‍मेदारी पड़ती है उसका दिल जानता है।

ग्‍यारह बज गए थे। शयामाचरण ने पद्मसिंह से कहा-मेरे भोजन का समय आ गया, अब जाता हूँ। आप संध्‍या समय मुझसे मिलिएगा।

पद्मसिंह ने कहा-हां-हां, शौक से जाइए। उन्‍होंने सोचा, जब ये भोजन में जरा-सी देर हो जाने से इतने घबराते हैं, तो दूसरों से क्‍या आशा की जाए? लोग जाति और देश के सेवक तो बनना चाहते हैं, पर जरा-सा भी कष्‍ट नहीं उठाना चाहते।

लाला भगतराम धूप में तख्‍ते पर बैठे हुक्‍का पी रहे थे। उनकी छोटी लड़की गोद में बैठी हुई धुएं को पकड़ने के लिए बार-बार हाथ बढ़ाती थी। सामने जमीन पर कई मिस्‍त्री और राजगीर बैठे हुए थे। भगतराम पद्मसिंह को देखते ही उठ खड़े हुए और पालागन करते बोले-मैंने शाम ही को सुना था कि आप आ गए। आज प्रात:काल आने वाला था, लेकिन कुछ ऐसा झंझट आ पड़ा कि अवकाश ही न मिला। यह ठेकेदारी का काम बड़े झगड़े का है। काम कराइए, अपने रुपये लगाइए, उस पर दूसरों की खुशामद कीजिए। आजकल इंजीनियर साहब किसी बात पर ऐसे नाराज हो गए हैं कि मेरा कोई काम उन्‍हें पसंद नहीं आता। एक पुल बनवाने का ठेका लिया था। उसे तीन बार गिरवा चुके हैं। कभी कहते हैं, यह नहीं बना। नफा कहां से होगा, उल्‍टे नुकसार की संभावना है। कोई सुनने वाला नहीं है। आपने सुना होगा, हिंदू मेंबरों का जलसा हो गया।

पद्मसिंह-हां, सुना और सुनकर शोक हुआ। आपसे मुझे पूरी आशा थी। क्‍या आप इस सुधार को उपयोगी नहीं समझते?

भगतराम-इसे केवल उपयोगी ही नहीं समझता, बल्कि ह्रदय से इसकी सहायता करना चाहता हूँ, पर मैं अपनी राय का मालिक नहीं हूँ। मैंने अपने को स्‍वार्थ के हाथों में बेच दिया है। मुझे आप ग्रामोफोन का रेकार्ड समझिए, जो कुछ भर दिया जाता है, वही कह सकता हूँ और कुछ नहीं।

पद्मसिंह-लेकिन आप यह तो जानते हैं कि जाति के हित में स्‍वार्थ से पार्थक्‍य होना चाहिए।

भगतराम-जी हां, इसे सिद्धांत रूप से मानता हूँ, पर इसे व्‍यवहार में लाने की शक्ति नहीं रखता। आप जानते होंगे, मेरा सारा कारबार सेठे चिम्‍मनलाल की मदद से चलता है। अगर उन्‍हें नाराज कर लूं तो यह सारा ठाठ बिगड़ जाए। समाज में मेरी जो कुछ मान-मर्यादा है, वह इसी ठाट-बाट के कारण है। विद्या और बुद्धि है ही नहीं, केवल इसी स्‍वांग का भरोसा है। आज अगर कलई खुल जाए, तो कोई बात भी न पूछे। दूध की मक्‍खी की तरह समाज से निकाल दिया जाऊं। बतलाइए, शहर में कौन है, जो केवल मेरे विश्‍वास पर हजारों रुपये बिना सूद के दे देगा, और फिर केवल अपनी ही फिक्र तो नहीं है। कम-से-कम तीन सौ रुपये मासिक गृहस्‍थी का खर्च है। जाति के लिए मैं स्‍वयं कष्‍ट झेलने के लिए तैयार हूँ, पर अपने बच्‍चों को कैसे निरवलंब कर दूं?

जब हम अपने किसी कर्त्तव्य से मुँह मोड़ते हैं, तो दोष से बचने के लिए ऐसी प्रबल युक्तियां निकालते हैं कि कोई मुँह न खोल सके। उस समय हम संकोच को छोड़कर अपने संबंध में ऐसी-ऐसी बातें कह डालते हैं कि जिनके गुप्‍त रहने ही में हमारा कल्‍याण है। लाला भगतराम के ह्रदय में यही भाव काम कर रहा था। पद्मसिंह समझ गए कि इससे कोई आशा नहीं। बोले-ऐसी अवस्‍था में आप पर कैसे जोर दे सकता हूँ? मुझे केवल एक वोट की फिक्र है, कोई उपाय बतलाइए, कैसे मिले?

भगतराम-कुंवर साहब के यहाँ जाइए। ईश्‍वर चाहेंगे तो उनका वोट आपको मिल जाएगा। सेठ बलभद्रदास ने उन पर तीन हजार रुपये की नालिश की है? कल उनकी डिगरी भी हो गई। कुंवर साहब इस समय बलभद्रदास से तने हुए हैं। वश चले तो गोली मार दें। फंसाने का एक लटका आपको और बताए देता हूँ। उन्‍हें किसी सभा का प्रधान बना दीजिए। बस, उनकी नकेल आपके हाथ मे हो जाएगी।

पद्मसिंह ने हंसक कहा-अच्‍छी बात है, उन्‍हीं के यहा चलता हूँ।

दोपहर हो गई थी, लेकिन पद्मसिंह को भूख-प्‍यास न थी। बग्‍घी पर बैठकर चले कुंवर साहब बरुना के किनारे एक बंगले में रहते थे। आध घंटे में जा पहुँचे।

बंगले के हाते में न कोई सजावट थी, न सफाई। फूल-पत्ती का नाम न था। बरामदे में कई कुत्ते जंजीर में बंधे खड़े थे। एक तरफ कई घोड़े बंधे हुए थे। कुंवर साहब को शिकार का बहुत शौक था। कभी-कभी कश्‍मीर तक चक्‍कर लगाया करते थे। इस समय वह सामने कमरे में बैठे हुए सितार बजा रहे थे। एक कोने में कई बंदूकें और बर्छियां रखी हुई थीं। दूसरी ओर एक बड़ी मेज पर एक घडि़याल बैठा था। पद्मसिंह कमरे में आए, तो उसे देखकर एक बार चौंक पड़े। खाल में ऐसी सफाई से भूसा भरा गया था कि उनमें जान-सी पड़ गई थी।

कुंवर साहब ने शर्माजी का बड़े प्रेम से स्‍वागत किया-आइए महाशय, आपके तो दर्शन दुर्लभ हो गए। घर से कब आए?

पद्मसिंह-कल आया हूँ।

कुंवर-चेहरा उतरा हुआ है, बीमार थे क्‍या?

पद्मसिंह-जी नहीं, बहुत अच्‍छी तरह से।

कुंवर-कुछ जलपान कीजिएगा?

कुंवर-जी हां, मुझे तो अपना ही सितार पसंद है। हारमोनियम और प्‍यानो सुनकर मुझे मतली-सी होने लगती है। इन अंग्रेजी बाजों ने हमारे संगीत को चौपट कर दिया, इसकी चर्चा ही उठ गई। जो कुछ कसर रह गई थी, वह थिएटरों ने पूरी कर दी। बस, जिसे देखिए, गजल और कव्‍वाली की रट लगा रहा है। थोड़े दिनों में धनुर्विद्या की तरह इसका भी लोप हो जाएगा। संगीत से ह्रदय में पवित्र भाव पैदा होते हैं। जब से गाने का प्रचार कम हुआ, हम लोग भाव-शून्‍य हो गए और इसका सबसे बुरा असर हमारे साहित्‍य पर पड़ा है। कितने शोक की बात है, जिस देश में रामायण जैसे अमूल्‍य ग्रंथ की रचना हुई, सूरसागर जैसा आनदंमय काव्‍य रचा गया, उसी देश में अब साधारण उपन्‍यासों के लिए हमको अनुवाद का आश्रय लेना पड़ता है। बंगाल और महाराष्‍ट्र में अभी गाने का कुछ प्रचार है, इसीलिए वहाँ भावों का ऐसा शैथिल्‍य नहीं है, वहाँ रचना और कल्‍पना-शक्ति का ऐसा अभाव नहीं है। मैंने तो हिन्‍दी साहित्‍य को पढ़ना ही छोड़ दिया। अनुवादों को निकाल डालिए, तो नवीन हिन्‍दी साहित्‍य में हरिश्‍चन्‍द्र के दो-चार नाटकों और चन्‍द्रकान्‍ता संतति के सिवा और कुछ रहता ही नहीं। संसार का कोई साहित्‍य इतना दरिद्र न होगा। उस पर तुर्रा यह है कि जिन महानुभावों ने दो-एक अंग्रेजी ग्रंथों के अनुवाद मराठी और बंगला अनुवादों की सहायता से कर लिए, वे अपने को धुरंधर साहित्‍यज्ञ समझने लगे हैं। एक महाशय ने कालिदास के कई नाटकों के पद्यबद्ध अनुवाद किए हैं, लेकिन वे अपने को हिन्‍दी का कालिदास समझते हैं। एक महाशय ने ‘मिल’ के दो ग्रंथों का अनुवाद किया है और वह भी स्‍वतंत्र नहीं, बल्कि गुजराती, मराठी आदि अनुवादों के सहारे, पर वह अपने मन में ऐसे संतुष्‍ट हैं, मानो उन्‍होंने हिन्‍दी साहित्‍य का उद्धार कर दिया। मेरा तो यह निश्‍चय होता जाता है कि अनुवादों से हिन्‍दी का अपकार हो रहा है। मौलिकता को पनपने का अवसर नहीं मिलने पाता।

पद्मसिंह को यह देखकर आश्‍चर्य हुआ कि कुंवर साहब का साहित्‍य से इतना परिचय है। वह समझते थे कि इन्‍हें पोलो और शिकार के सिवाय और किसी से प्रेम न होगा। वह स्‍वयं हिन्‍दी साहित्‍य से अपरिचित थे, पर कुंवर साहब के सामने अपनी अनभिज्ञता प्रकट करते संकोच होता था। उन्‍होंने इस तरह मुस्‍कराकर देखा, मानों यह सब बातें उन्‍हें पहले ही से मालूम थीं, और बोले-आपने तो ऐसा प्रश्‍न उठाया, जिस पर दोनों पक्षों की ओर से बहुत कुछ कहा जा सकता है। पर इस समय मैं आपकी सेवा में किसी और ही काम से आया हूँ। मैंने सुना है कि हिंदू मेंबरों के जलसे में आपने सेठों का पक्ष ग्रहण किया।

कुंवर साहब ठठाकर हंसे। उनकी हंसी कमरे में गूंज उठी। पीतल की ढाल, जो दीवार से लटक रही थी, इस झंकार से थरथराने लगी। बोले-सच कहिए, आपने किससे सुना?

पद्मसिंह इस कुसमय हंसी का तात्‍पर्य न समझकर कुछ भौंचक-से हो गए। उन्‍हें मालूम हुआ कि कुंवर साहब मुझे बनाना चाहते हैं। चिढ़कर बोले-सभी कह रहे हैं, किस-किसका नाम लूं?

कुंवर साहब ने फिर जोर से कहकहा मारा और हंसते हुए पूछा-और आपको विश्‍वास भी आ गया?

पद्मसिंह को अब इसमें कोई संदेह नरहा कि यह सब मुझे झेंपाने का स्‍वांग है, जोर देकर बोले-अविश्‍वास करने के लिए मेरे पास कोई कारण नहीं है। कुंवर-कारण यही है कि मेरे साथ घोर अन्‍याय होगा। मैंने अपनी समझ में अपनी संपूर्ण शक्ति आपके प्रस्‍ताव के समर्थन में खर्च कर दी थी। यहाँ तक कि मैंने विरोध को गंभीर विचार के लायक भी न सोचा। व्‍यंग्‍योक्ति ही से काम लिया। (कुछ याद करके) हां, एक बात हो सकती है। समझ गया। (फिर कहकहा मारकर) अगर यह बात है, तो मैं कहूँगा कि म्‍युनिसिपैलिटी बिल्‍कुल बछिया के ताऊ लोगों से ही भरी हुई है। व्‍यंग्‍योक्ति तो आप समझते ही होंगे। बस, यह सारा कसूर उसी का है। किसी सज्‍जन ने उसका भाव न समझा। काशीके सुशिक्षित, सम्‍मानित म्‍युनिसिपल कमिश्‍नरों में किसी ने भी एक साधारण-सी बात न समझी। शोक ! महाशोक ! ! महाशय, आपको बड़ा कष्‍ट हुआ। क्षमा कीजिए। मैं इस प्रस्‍ताव का ह्रदय से अनुमोदन करता हूँ।

पद्मसिंह भी मुस्‍कराए, कुंवर साहब की बातों पर विश्‍वास आया। बोले-अगर इन लोगों ने ऐसा धोखा खाया, तो वास्‍तव में उनकी समझ बड़ी मोटी है। मगर प्रभाकर राव धोखे में जा जाएं, यह समझ में नहीं आता, पर ऐसा मालूम होता है कि नित्‍य अनुवाद करते-करते उनकी बुद्धि भी गायब हो गई है।

पद्मसिंह जब यहाँ से चले, तो उनका मन ऐसा प्रसन्‍न था, मानो वह किसी बड़े रमणीक स्‍थान की सैर करके आए हों। कुंवर साहब के प्रेम और शील ने उन्‍हें वशीभूत कर लिया था।

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