मेरी सूचीपढ़ना शुरू करें

सेवासदन

अध्याय ५४

५४ / ५५
सभी अध्याय

क सल बीत गया। पंडित मदनसिंह पहले तीर्थ यात्रा पर उधार खाए बैठे थे। जान पड़ता था, सदन के घर आते ही एक दिन भी न ठहरेंगे, सीधे बद्रीनाथ पहुँचकर दम लेंगे, पर जब से मदन आ गया है, उन्‍होंने भूलकर भी तीर्थ-यात्रा का नाम नहीं लिया। पोते को गोद में लिए आसामियों का हिसाब करते हैं, खेतों की निगरानी करते हैं। माया ने और भी जकड़ लिया है। हां, भामा अब कुछ निश्चित हो गई है। पड़ोसिनों से वार्तालाप करने का कर्तव्‍य अपने सिर से नहीं हटाया। शेष कार्य उसने शान्‍ता पर छोड़ दिए हैं।

पंडित पद्मसिंह ने वकालत छोड़ दी। अब वह म्‍युनिसिपैलिटी के प्रधान कर्मचारी हैं। इस काम से उन्‍हें बहुत रूचि है। शहर दिनों-दिन उन्‍नति कर रहा है। साल के भीतर ही कई नई सड़कें, नए बाग तैयार हो गए हैं, अब उनका इरादा है इक्‍के और गाड़ी वालों के लिए शहर के बाहर एक मुहल्‍ला बनवा दें। शर्माजी के कई पहले के मित्र अब उकने विरोधी हो गए हैं और पहले के कितने ही विरोधियों से मेल हो गया है, किंतु महाशय विट्ठलदास पर उनकी श्रद्धा दिनों‍दिन बढ़ती जाती है। वह बहुतचाहते हैं कि महाशय को म्‍युनिसिपैलिटी में कोई अधिकार दें, पर विट्ठलदास राजी नहीं होते। वह नि:स्‍वार्थ कर्म की प्रतिज्ञा को नहीं तोड़ना चाहते। उनको विचार है कि अधिकारी बनकर वह अतना हित नहीं कर सकते, जितना पृथक् रहकर कर सकते हैं। उनका विधवाश्रम इन दिनों बहुत उन्‍नति पर है और म्‍युनिसिपैलिटी से उसे विशेष सहायता मिलती है। आजकल वह कृषकों की सहायता के लिए एक कोष स्‍थापित करने का उद्योग कर रहे हैं, जिससे किसानों को बीज और रुपये नाममात्र सूद पर उधार दिए जा सकें, इस सत्‍कार्य में सदन बाबू विट्ठलदास का दाहिना हाथ बना हुआ है।

सदन का अपने गांव में मन नहीं लगा। वह शान्‍ता को वहाँ छोड़कर फिर गंगा किनारे के झोंपड़े में आ गया है और उस व्‍यवसाय को खूब बढ़ा रहा है। उसके पास अब पांच नावें हैं और सैकड़ों रुपये महीने का लाभ हो रहा है। वह अब एक स्‍टीमर मोल लेने का विचार कर रहा है।

स्‍वामी गजानन्‍द अधिकतर देहातों में रहते हैं। उन्‍होंने निर्धनों की कन्‍याओं का उद्धार करने के निमित्त अपना जीवन अर्पण कर दिया है। शहर में आते हैं, तो दो-एक दिन से अधिक नहीं ठहरते।

अब कुछ और पढ़ें