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आदर्श हिंदू

अध्याय ४५

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स्वमग्नं ईडितः कव्यवाहना वाड्ढव्यानि सुरभोणि कृत्वी प्रादा: पितृभ्यः स्वधयाते अक्षन्नद्विस्वंदेव प्रयाताहवीणषि।

ॠग्वेद ६६

ये चक्ष पितरो ये च नेहयाश्च विद्मया णाँउचनप्रविद्म

वेत्ययति ते जातवेदः स्वधाभिर्यज्ञऽ सुंकृतंजुषस्व।

ऋग्वेद ६७”

मर्मानुवाद

“जो जीवित हैं, जो मृतक हो गए, जो उत्पन्न हुए हैं और जो यज्ञ करनेवाले हैं उनके लिये घृत की कुल्या मधु- धारा प्राप्त हो। हे अग्नि, जो पितर गाड़े गए हैं, जो पड़े रहे हैं, जो अग्नि से जलाए गए अथवा जो फेंके गए हैं उन सबके लिये हवि भक्षण करने को सम्यक् प्रकार से ले जाओ। जो अग्नि में जलाए गए हैं और जो नहीं जलाए गए हैं अथवा जा हवि भक्षण करके स्वर्ग में आनंन्दित है, है अग्नि, उनके अर्थ सेवन करने को ले जाओ क्योंकि तुम उन्हें जानते हो। हे कव्यवाहन अग्नि, तुम देवताओं और ॠत्विजों से स्तुत किए गए हो। तुमने हवियों को सुगंधित करके धारण किया है। पितृमंत्रों से पितरों के लिये दिया गया है और उन पितरों ने भी भक्षण किया है। अब तुम भी शुद्ध हवि को भक्षण करो। ये जो पितर इस लोक में (अन्य) देह धारण करके वर्तमान हैं, जो इस लोक में नहीं अर्थात् स्वर्ग में हैं, जिन पितरों को हम जानते अथवा स्मरण न होने से नहीं जानते, हे अग्नि, वे जितने पितर हैं उन सबको तुम सर्वज्ञ होकर जानते हो। उन पितरों को अन्नों से शुभ यज्ञ में सेवन करो।” अब इससे अधिक चाहिए तो पंडित ज्वालाप्रसाद मिश्र का “दयानंद तिमिर मारकर देख लीजिए, “महताब दिवाकर” देख लीजिए और छोटे मोटे नेक ग्रंथों का अनुशीलन कर लीजिए ताकि आपको वेदों में प्रमाण ढूँढ़ने में सुगमता पड़े।

“अजी हजरत, आपके पुरखा तो फल्गू में से हाथ निकाल- कर स्वयं पिंड ग्रहण क्रिया करते थे ना? अब कहाँ गए? अब भी तो कहीं दिखलाई देते होंगे।”

“हाँ हाँ! केवल हाथ निकालकर ही क्यों? स्वयं समक्ष खड़े होकर ले सकते हैं। पितर तो पितर, ब्रह्मादिक देवता ले सकते हैं। स्वयं आपके निराकार परमात्मा साकार बनकर ले सकते हैं। उन्होंने एक बार नहीं हजारों बार अवतार लेकर भक्तों का उपकार किया है। श्रद्धा मात्र चाहिए, सदाचार चाहिए, अनन्य भक्ति चाहिए और परमेश्वर के चरणारविदों में लैा लगाने के लिये मानसिक शक्ति चाहिए। जनाव, हाथी के दाँत दिखाने के और और खाने के और हैं। आपमें से यह (एक की ओर इंगित करके) स्वयं श्राद्ध करा- कर दक्षिणा ले रहे थे और यह (दूसरे को दिखाकर) श्राद्ध कर रहे थे। किंतु सच मानिए आप जैसे अश्रद्ध आस्तिकों से नास्तिक और डावाँडोल नास्तिक से आस्तिक अच्छा है। आप न इधर में न उधर में। जो आज डंका पीटने आए हो तो कल श्राद्ध करने कराने क्यों गए थे ?”

“केवल आप जैसे हठधर्मियों के दबाव से, घरवालों के संकोच से अथवा निंदा के भय से। नहीं तो श्राद्ध में कुछ लाभ नहीं।” तब आप लोगों में मानसिक शाक्ति बिलकुल नहीं! शायद माता पिता जब अति वृद्ध हो जायँ तब उन्हें आप खाने को भी न दें। क्योंकि उन्हें देने से कुछ लाभ नहीं। बेशक आप लाभ के बिना बात भी नहीं करते। मुशकिल तो यह है कि उन लाभों का सुझाने के लिये कोई शिक्षक भी परदेशी होना चाहिए जो आपको बतलावे कि गले का कफ हटाने को आचमन और सुस्ती छुड़ाने को मार्जन किया जाता है। और जब आपसे पूछा जाय कि गले का काफ हटाने के लिये आच- मन की जगह लोटा भर पानी पी लो और यदि स्नान से सुस्ती न छूटी तो मार्जन से क्या छूटेगी तो आप बगलें झाँकने लगें। खैर इसी तरह कोई दिन कोई न कोई श्राद्ध का भी ऐसा ही मतलब समझानेवाला मिल जायगा, तब तक किए जाइए। छोड़िए मत। “अकरणान्मंदकरण श्रेय:।”

“अच्छा आप ही बतलाइए”

“हमें तो जो कुछ बतलाना था बतला दिया। वेद मत से, जिस सिद्धांत के अनुकूल धर्म समझकर हम लोग करते हैं सो सब कह दिया। हमारी पूर्व पुरुषों पर भक्ति है इसलिये करते हैं, इस सिलसिले में उनके गुणों का स्मरण करके अपना मन पवित्र करते हैं, उनके गुणों का अनुकरण करने का प्रयत्न करते हैं और अपनी श्रद्धा के अनुसार शास्त्र के प्रमाणों से उनका उद्धार करने के लिये करते हैं। जैसी श्रद्धा वैसा फल। फल जो मिल रहा है प्रत्यक्ष है, अनु- भवगम्य है। अभ्यास करके देखिए। चित्त की एका- ग्रता चाहिए।”

इस तरह के वाद विवाद के बाद मध्यस्थ महाशय ने जो फैसला सुनाया उसका सार यही है —

“श्राद्ध युक्ति प्रमाणों से, वेदादि ग्रंथों के मत से सिद्ध हो गया। नोटिस के अनुसार एक हजार रुपया पंडित प्रिया- नाथ को दिला दिया जावे।”

इस पर पंडितजी ने मध्यस्थ को, प्रतिपक्षियों को और श्रोताओं को धन्यवाद देते हुए कह दिया कि “यह एक हजार और एक हजार रूपया मेरी ओर से, यों दो हजार रुपया यहाँ ही गयाजी में किसी लोकोपकार के लिये है।” ऐसा कहते ही “वाह वाह! धन्य! शाबाश!” के गगनभेदी उच्चा- रण के साथ सभा विसर्जित हुई।

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