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गबन

चौबीस

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क महीना गुजर गया। प्रयाग के सबसे अधिक छपने वाले दैनिक पत्र में एक नोटिस निकल रहा है, जिसमें रमानाथ के घर लौट आने की प्रेरणा दी गई है, और उसका पता लगा लेने वाले आदमी को पांच सौ रुपये इनाम देने का वचन दिया गया है, मगर अभी कहीं से कोई खबर नहीं आई। जालपा चिंता और दुःख से धुलती चली जाती है। उसकी दशा देखकर दयानाथ को भी उस पर दया आने लगी है। आखिर एक दिन उन्होंने दीनदयाल को लिखा-आप आकर बहू को कुछ दिनों के लिए ले जाइए। दीनदयाल यह समाचार पाते ही घबड़ाए हुए आए; पर जालपा ने मैके जाने से इंकार कर दिया। | दीनदयाल ने विस्मित होकर कहा-क्या यहां पड़े-पड़े प्राण देने का विचार है?

जालपा ने गंभीर स्वर में कहा-अगर प्राणों को इसी भांति जाना होगा, तो कौन रोक सकता है। मैं अभी नहीं मरने की दादाजी, सच मानिए। अभागिनों के लिए वहां भी जगह नहीं है।

दीनदयाल-आखिर चलने में हरज ही क्या है। शहजादी और बसन्ती दोनों आई हुई हैं। उनके साथ हंस-बोलकर जी बहलता रहेगा।

जालपा-यहां लाला और अम्मांजी को अकेली छोड़कर जाने को मेरा जी नहीं चाहता। जब रोना ही लिखा है, तो रोऊंगी।

दीनदयाल-यह बात क्या हुई, सुनते हैं कुछ कर्ज हो गया था, कोई कहता है, सरकारी रकम खा गए थे।

जालपा-जिसने आपसे यह कहा, उसने सरासर झूठ कहा।

दीनदयाल तो फिर क्यों चले गए? जालपा–यह मैं बिल्कुल नहीं जानती। मुझे बार-बार खुद यही शंका होती है।

दीनदयाल-लाला दयनाथ से तो झगड़ा नहीं हुआ?

जालपा-लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगड़ा क्या करेंगे। उन्हें घूमने का शौक था। सोचा होगा–यों तो कोई जाने न देगा, चलो भाग चलें।

दीनदयाल–शायद ऐसा ही हो। कुछ लोगों को इधर-उधर भटकने की सनक होती है। तुम्हें यहां जो कुछ तकलीफ हो, मुझसे साफ-साफ कह दो। खरच के लिए कुछ भेज दिया करूं?

जालपा ने गर्व से कहा-मुझे कोई तकलीफ नहीं है, दादाजी ! आपकी दया से किसी चीज की कमी नहीं है।

दयानाथ और जागेश्वरी, दोनों ने जालपा को समझाया; पर वह जाने पर राजी न हुई। तब दयानाथ झुंझलाकर बोले-यहां दिन-भर पड़े-पड़े रोने से तो अच्छा है।

जालपा-क्या वह कोई दूसरी दुनिया है, या मैं वहां जाकर कुछ और हो जाऊंगी। और फिर रोने से क्यों डरूं? जब हंसना था, तब हंसती थी, जब रोना है, तो रोऊंगी। वह काले कोसों चले गए हों; पर मुझे तो हरदम यहीं बैठे दिखाई देते हैं। यहां वे स्वयं नहीं हैं, पर घर की एकएक चीज में बसे हुए हैं। यहां से जाकर तो मैं निराशा से पागल हो जाऊंगी।

दीनदयाल समझ गए यह अभिमानिनी अपनी टेक न छोड़ेगी। उठकर बाहर चले गए। संध्या समय चलते वक्त उन्होंने पचास रुपये का एक नोट जालपा की तरफ बढ़ाकर कहा-इसे रख लो, शायद कोई जरूरत पड़े।

जालपा ने सिर हिलाकर कहा-मुझे इसकी बिल्कुल जरूरत नहीं है, दादाजी। हां, इतना चाहती हूं कि आप मुझे आशीर्वाद दें। संभव है, आपके आशीर्वाद से मेरा कल्याण हो। | दीनदयाल की आंखों में आंसू भर आए, नोट वहीं चारपाई पर रखकर बाहर चले आए।

क्वार का महीना लग चुका था। मेघ के जल-शुन्य टुकड़े कभी-कभी आकाश में दौड़ते नजर आ जाते थे। जालपा छत पर लेटी हुई उन मेघ-खंडों की किलोलें देखा करती। चिंता-व्यथित प्राणियों के लिए इससे अधिक मनोरंजन की और वस्तु ही कौन है? बादल के टुकड़े भाति-भांति के रंग बदलते, भांति-भाँति के रूप भरते, कभी आपस में प्रेम से मिल जाते, कभी रूठकर अलग-अलग हो जाते, कभी दौड़ने लगते, कभी ठिठक जाते। जालपा सोचती, रमानाथ भी कहीं बैठे यही मेघ-क्रीड़ा देखते होंगे। इस कल्पना में उसे विचित्र आनंद मिलता। किसी माली को अपने लगाए पौधों से, किसी बालक को अपने बनाए हुए घरौंदों से जितनी आत्मीयता होती है, कुछ वैसा ही अनुराग उसे उन आकाशगामी जीवों से होता था। विपत्ति में हमारा मन अंतर्मुखी हो जाता है। जालपा को अब यही शंका होती थी कि ईश्वर ने भी पापों का यह दंड दिया है। आखिर रमानाथ किसी का गला दबाकर ही तो रोज रुपये लाते थे। कोई खुशी से तो न दे देता। यह रुपये देखकर वह कितनी खुश होती थी। इन्हीं रुपयों से तो नित्य शौक श्रृंगार की चीजें आती रहती थीं। उन वस्तुओं को देखकर अब उसका जी जलता था। यहीं सारे दु:खों की मूल हैं। इन्हीं के लिए तो उसके पति को विदेश जाना पड़ा। वे चीजें उसकी आंखों में अब कांटों की तरह गड़ती थीं, उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं।

आखिर एक दिन उसने इन चीजों को जमा किया-मखमली स्लीपर, रेशमी मोजे, तरह-तरह की बेलें, फीते, पिन, कंघियां, आईने, कोई कहां तक गिनाए। अच्छा-खासा एक देर हो गया। वह इस ढेर को गंगा में डुबा देगी, और अब से एक नए जीवन का सूत्रपात करेगी। इन्हीं वस्तुओं के पीछे, आज उसकी यह गति हो रही है। आज वह इस मायाजाल को नष्ट कर डालेगी। उनमें कितनी ही चीजें तो ऐसी सुंदर थीं कि उन्हें फेंकते मोह आता था; मगर ग्लानि की उस प्रचंड ज्वाला को पानी के ये छींटे क्या बुझाते। आधी रात तक वह इन चीजों को उठाउठाकर अलग रखती रही, मानो किसी यात्रा की तैयारी कर रही हो। हां, यह वास्तव में यात्रा ही थी-अंधेरे से उजाले की, मिथ्या से सत्य की। मन में सोच रही थी, अब यदि ईश्वर की दया हुई और वह फिर लौटकर घर आए, तो वह इस तरह रहेगी कि थोड़े-से-थोड़े में निर्वाह हो जाय। एक पैसा भी व्यर्थ न खर्च करेगी। अपनी मजदूरी के ऊपर एक कौड़ी भी घर में न आने देगी। आज से उसके नए जीवन का आरंभ होगा। ज्योंही चार बजे; सड़क पर लोगों के आने-जाने की आहट मिलने लगी। जालपा ने बेग उठा लिया और गंगा-स्नान करने चली। बेग बहुत भारी था, हाथ में उसे लटकाकर दस कदम भी चलना कठिन हो गया। बार-बार हाथ बदलती थी। यह भय भी लगा हुआ था कि कोई देख न ले। बोझे लेकर चलने का उसे कभी अवसर न पड़ा था। इक्के वाले पुकारते थे; पर वह इधर कान न देती थी। यहां तक कि हाथ बेकाम हो गए, तो उसने बेग को पीठ पुरे रख लिया और कदम बढ़ाकर चलने लगी। लंबा घूंघट निकाल लिया था कि कोई पहचान न सके। | वह घाट के समीप पहुंची, तो प्रकाश हो गया था। सहसा उसने रतन को अपनी मोटर पर आते देखा। उसने चाहा, सिर झुकाकर मुंह छिपा ले; पर रतन ने दूर हो से पहचान लिया, मोटर रोककर बोलीं-कहां जा रही हो बहन, यह पीठ पर बेग कैसा है?

जालपा ने घूंघट हटा लिया और नि:शंक होकर बोली-गंगा-स्नान करने जा रही हूं।

रतन–मैं तो स्नान करके लौट आई, लेकिन चलो, तुम्हारे साथ चलती हूँ। तुम्हें धर पहुंचाकर लौट जाऊंगी। बेग रख दो।

जालपा-नहीं-नहीं, यह भारी नहीं हैं। तुम जाओ, तम्हें देर होगी। मैं चली जाऊंगी।

मगर रतन ने न माना, कार से उतरकर उसके हाथ से बेग ले ही लिया और कार में रखती हुई बोली-क्या भरा है तुमने इसमें, बहुत भारी है। खोलकर देखें?

जालपा- इसमें तुम्हारे देखने लायक कोई चीज नहीं है। बेग में ताला न लगा था। रतन ने खोलकर देखा, तो विस्मित होकर बोली-इन चीजों को कहां लिए जाती हो?

जालपा ने कार पर बैठते हुए कहा-इन्हें गंगा में बहा दूंगी।

रतन में और भी विस्मय में पड़कर कहा-गंगा में कुछ पागल तो नहीं हो गई हो। चलो, घर लौट चल। बेग रखकर फिर आ जाना।

जालपा ने दृढता से कहा-नहीं रतन, मैं इन चीजों को डुबाकर ही जाऊंगी।

रतन–आख़िर क्यों?

जालपा-पहले कार को बढ़ाओ, फिर बताऊं।

रतन-नहीं, पहले बता दो ।

जालपा-नहीं, यह न होगा। पहले कार को बढ़ाओ। रतन ने हारकर कार को बढ़ाया और बोली- अच्छा अब तो बताओगी?

जालपा ने उलाहने के भाव से कहा-इतनी बात तो तुम्हें खुद ही समझ लेनी चाहिए थी। मुझसे क्या पूछती हो। अब वे चीजें मेरे किस काम की हैं। इन्हें देख-देखकर मुझे दुख होता है। जब देखने वाला ही न रहा, तो इन्हें रखकर क्या करूं?

रतन ने एक लंबी सांस खींची और जालपा का हाथ पकड़कर कांपते हुए स्वर में बोली–बाबूजी के साथ तुम यह बहुत बड़ा अन्याय कर रही हो, बहन। वे कितनी उमंग से इन्हें लाए होंगे। तुम्हारे अंगों पर इनकी शोभा देखकर कितना प्रसन्न हुए होंगे। एक-एक चीज उनके प्रेम की एक-एक स्मृति है। उन्हें गंगा में बहाकर तुम उस प्रेम का घोर अनादर कर रही हो।

जालपा विचार में डूब गई, मन में संकल्प-विकल्प होने लगा; किंतु एक ही क्षण में वह फिर संभल गई, बोली-यह बात नहीं है बहन ! जब तक ये चीजें मेरी आंखों से दूर न हों जाएंगी, मेरा चित्त शांत न होगा। इसी विलासिता ने मेरी यह दुर्गति की है। यह मेरी विपत्ति की गठरी है, प्रेम की स्मृति नहीं, प्रेम तो मेरे हृदय पर अंकित है।

रतन—तुम्हारी हृदय बड़ा कठोर है जालपा, मैं तो शायद ऐसा न कर सकती।

जालपा-लेकिन मैं तो इन्हें अपनी विपत्ति का मूल समझती हूं।

एक क्षण चुप रहने के बाद वह फिर बोली-उन्होंने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है, बहन । जो पुरुष अपनी स्त्री से कोई परदा रखता है, मैं समझती हूं, वह उससे प्रेम नहीं करता। मैं उनकी जगह पर होती, तो यों तिलांजलि देकर न भागती। अपने मन की सारी व्यथा कह सुनाती और जो कुछ करती, उनकी सलाह से करती। स्त्री और पुरुष में दुराव कैसा।

रतन ने गंभीर मुस्कान के साथ कहा-ऐसे पुरुष तो बहुत कम होंगे, जो स्त्री से अपना दिल खोलते हों। जब तुम स्वयं दिल में चोर रखती हो, तो उनसे क्यों आशा रखती हो कि वे तुमसे कोई परदा न रखें। तुम ईमान से कह सकती हो कि तुमने उनसे परदा नहीं रखा?

जालपा ने सकुचाते हुए कहा-मैंने अपने मन में चोर नहीं रखा।

रतन ने जोर देकर कहा-झूठ बोलती हो, बिल्कुल झूठ, अगर तुमने विश्वास किया होता, तो वे भी खुलते।

जालपा इस आक्षेप को अपने सिर से न टाल सकी। उसे आज ज्ञात हुआ कि कपट का आरंभ पहले उसी की ओर से हुआ।

गंगा का तट आ पहुंचा। कार रुक गई। जालपा उतरी और बेग को उठाने लगी, किंतु रतन ने उसका हाथ हटाकर कहा-नहीं, मैं इसे न ले जाने दूंगी। समझ लो कि डूब गए।

जालपा–ऐसा कैसे समझ लें । रतन-मुझ पर दया करो, बहन के नाते।

जालपा–बहन के नाते तुम्हारे पैर धो सकती हूं, मगर इन कांटों को हृदय में नहीं रख सकती।

रतन ने भौंहें सिकोड़कर कहा-किसी तरह न मानोगी? जालपा ने स्थिर भाव से कहा-हां, किसी तरह नहीं।

रतन ने विरक्त होकर मुंह फेर लिया। जालपा ने बेग उठा लिया और तेजी से घाट से उतरकर जल-तट तक पहुंच गई, फिर बेग को उठाकर पानी में फेंक दिया। अपनी निर्बलता पर यह विजय पाकर उसका मुख प्रदीप्त हो गया। आज उसे जितना गर्व और आनंद हुआ, उतना इन चीजों को पाकर भी न हुआ था। उन असंख्य प्राणियों में जो इम समय स्नान-ध्यान कर रहे थे, कदाचित् किसी को अपने अंत:करण में प्रकाश का ऐसा अनुभव न हुआ होगा। मानो प्रभात की सुनहरी ज्योति उसके रोम-रोम में व्याप्त हो रही है।

जब वह स्नान करके ऊपर आई, तो रतन ने पूछा-डुबा दिया?

जालपा-हां।

रतन-बड़ी निठुर हो।

जालपा-यही निठुरता मन पर विजय पाती है। अगर कुछ दिन पहले निठुर हो जाती, तो ज़ यह दिन क्यों आता। कार चल पड़ी।

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