लख चौरासी जीअ जोनि महि भ्रमन नंदुबहु थाको रे।लगति हेतु अवतार लियो है भाग बड़ी बपुरा को रे॥तुम जो कहत हौ नंद को नंदन नंद सु नंदन काको रे॥धरनि अकास दसों दिसि नाहींे तब इहु नंद कहायो रे॥संकट नहीं परै जोनि नहिं आवै नाम निरंजन जाको रे।कबीर को स्वामी ऐसो ठाकुर जाकै माई न बापो रे॥185॥

