मन मेरे, मानहि सिख मेरी। जो निजु भगति चहै हरि केरी ॥ १ ॥उर आनहि प्रभु-कृत हित जेते। सेवहि ते जे अपनपौ चेते ॥ २ ॥दुख-सुख अरु अपमान-बड़ाई। सब सम लेखहि बिपति बिहाई ॥ ३ ॥सुनु सठ काल-ग्रसित यह देही। जनि तेहि लागि बिदूषहि केही ॥ ४ ॥तुलसिदास बिनु असि मति आयै। मिलहिं न राम कपट-लौ लाये ॥ ५ ॥

मन मेरे, मानहि सिख मेरी
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट