सघन कुंज, घन घन–तिमिरु, अधिक अँधेरी राति।तऊ न दुरिहै, स्याम वह, दीपसिखा सी जाति॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
चलत पाइ निगुनी गुनी, धनु मनि-मुत्तिय-मालबिहारीकविताचलत पाइ निगुनी गुनी, धनु मनि-मुत्तिय-मालबिहारी२ मिनट का पाठ