दुइ दुइ लोचन पेखा। हौं हरि बिन और न देखा॥नैन रहे रंग लाई। अब बेगल कहन न जाई॥हमारा भर्म गया भय भागा। जब राम नाम चितु लागा॥बाजीगर डंक बजाई। सब खलक तमासे आई॥बाजीगर स्वांग सकेला। अपने रंग रवै अकेला॥कथनी कहि धर्म न जाई। सब कथि कथि रही लुकाई॥जाकौ गुरु मुखि आप बुझाई। ताके हिरदै रह्या समाई॥गुरु किंचित किरपा कीनी। सब तन मन देह हरि लीनी॥कहि कबीर रंगि राता। मिल्यो जग जीवनदाता॥115॥

