राम राइ को ऐसा बैरागी, हरि भजि मगन रहै बिष त्यागी॥ टेक॥ब्रह्मा एक जिनि सृष्टि उपाई, नाँव कुनाल धराया।बहु विधि भाँडै उमही घड़िया, प्रभु का अंत न पाया॥तरवर एक नाँनाँ बिधि फलिया, ताकै मूल न साखा।भौजलि भूलि रह्या से प्राणी सो फल कदे न चाखा॥कहै कबीर गुर बचन हेत करि और न दुनियाँ आथी।माटी का तन माटी मिलिहै, सबद गुरु का साथी॥268॥

