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कारो तन, करो मुख, कुटिल कठोर कूर

कवित्त · लगभग २ मिनट
कारो तन, करो मुख, कुटिल कठोर कूर,क्यौं न करि देत बिधि ऐसै महापापी को।छूवत न कोऊ नेकु बैठन न देत नीरे,काठ लों कठोर घोर आखर अलापो को॥गोकुल कहत वाहि वैसे ही जगत निंदै,करिबे न जोग इतनी हो मदिरापी को।पतित कहावै क्यौं न पक्षी में काग जो पै,पालत है तोसो पिक अपत उतापौ को॥

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